Wednesday, July 26, 2017

अंतरात्मा की आवाज़

अंतरात्मा की आवाज़ क्या होती है, आखिर ये बार बार कैसे जगती है, कैसे हवा के रुख के साथ खुद को भी बदलती है। ये बिहार के फिर से नए बने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बेहतर शायद कोई नही जान सकता। ये वही नीतीश हैं जिन्हों ने अपना राजनीतिक जीवन जेपी और लोहिया की विचारधारा से लालू यादव के साथ शुरू की लेकिन फिर नीतीश की अंतरात्मा जागी वो बाजपेयी जी की NDA में शामिल हो गए उसी एनडीए में जिसके सीएम नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में गुजरात जला, हज़ारों बेगुनाह मारे गए, देश से दुनिया तक ने इसको और इसकी हक़ीक़त देखी जानी, तब माननीय नीतीश जी की अंतरात्मा उन पीड़ितों का दर्द देख नही जागी। लेकिन 2013 आते आते जब NDA बदल चुका था नीतीश बाबू की पूछ कम हो रही थी और अल्पसंख्यक वोटों का किनारा दिखने लगा तो उनके तबके एनडीए के पीएम पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खून से सने हाथ दिखे। गुजरात कांड के करीब 12 साल बाद, तब तक तो शायद CBI और जांच एजेंसियां तक उसे भूल चुकी थीं, लेकिन दशक बाद दोषी को ढूंढ निकाला, उनकी अंतरात्मा दूसरी बार जागी जिस बीजेपी के साथ 17 साल का याराना रहा उसे पल भर में झटक दिया। 2014 के आम चुनाव आये नीतीश की अगुवाई वाली जदयू बिहार में अपना अस्तिस्त्व खोने लगी 40 में महज 2 सीट मिली, नीतीश को खिसकते अल्पसंख्यक वोट दिखने लगे तो फिर उनकी अंतरात्मा जागी, सीएम पद से इस्तीफा दे दिया। जीतन राम मांझी का दलित कार्ड खेला, लेकिन महज चैन महीनों में ही नीतीश की अंतरात्मा फिर जागती है। वो मांझी को हटा फिर सत्ता की कुर्सी पे काबिज हो जाते हैं। लोकसभा चुनाव में अल्पसंख्यक वोट छिटके तो इनकी अंतरात्मा को तो जागना ही था इस बार उस लालू के साथ जा मिले जिस 17 साल कोसते रहे, साथ मे उसी कांग्रेस का हाथ जिसकी खिलाफत कर राजनीति की क ख ग सीखी, खैर अंतरात्मा जागी तो ये महागठबंधन ले कर आई। 2015 के विधानसभा चुनाव में बिहार की जनता ने बीजेपी के खिलाफ इस गठबंधन को सिर आँखों पर बिठाया। प्रचंड बहुमत और RJD सबसे से बड़ी पार्टी होने के बाद भी नीतीश को बिहार की कमान मिली । कभी बीजेपी की गोद मे सोने वाले नीतीश आज एकदम फ्रेश सेक्युलर हो गए थे। खैर देश मे मोदी सरकार के नेतृत्व में माहौल बिगड़ा, मुसलमान और दलितों पे अत्याचार होने लगे तो इन्ही नीतीश बाबू ने ट्वीट कर कर बीजेपी की साम्प्रदायिकता को बताया। लेकिन फिर वक्त बदला। मोदी ने नोटबन्दी, जीएसटी जैसे फैसले लिए विपक्ष में रहते हुए भी नीतीश की अंतरात्मा जागी वो मोदी के साथ खड़े दिखे। इस बीच देश मे किसानों का आंदोलन शुरू हो तो फिर उसी मोदी को कोसने लगे। इस बीच 2019 चुनाव की चर्चा होने लगी के लोग नीतीश में एक पीएम की झलक देखने लगे, लेकिन नीतीश बाबू को पता था राष्ट्रवाद के इस युग मे मोदी की बेजेपी से पार पाना मुमकिन नहीं, तो उन्होंने फिर बीजेपी से नजदीकियां बढ़ानी शुरू कर दी, और एक बार फिर नीतीश की अंतरात्मा जाएगी उन्होंने कल तक बड़े भाई लालू के हाथ झटका और महज चैन पलों पहले तक सम्पदायक लगने वाली बेजेपी के गोद मे फिर जा बैठे। अगर नीतीश बाबु ज़ीरो टॉलरेन्स की बात थी तो आप तेजस्वी को बाहर निकलते फिर अगर आरजेडी हाथ खिंचती तो भगवा थाम लेते, लेकिन आपने इस्तीफा दे दिया। अगर आप इतनी साफ छवि पसन्द हैं तो विधानसभा भंग कर नए जनादेश के लिए जाते, क्योंकि ये जनादेश आपको नहीं सम्पदायिक शक्तियों के खिलाफ बिहार की जनता ने महागठबंधन को दिया था। नीतीश ने कहा उन्हीने अंतरात्मा की आवाज़ पर फैसला लिया, लेकिन क्या बात है अंतरात्मा की बात दूसरे भी पढ़ने लगे नीतीश के इस्तीफे के 2 मिनट के अंदर ही उनके पुराने (जो फिर से नए बने) का बधाई संदेश आ जाता है। बीजेपी तुरंत साथ का एलान कर देती है, नीतीश के आवास पर दो ढाई सौ लोगों का डिनर तैयार हो जाता है। सरकार बनाने का दावा भी पेश हो जाता है। सब अंतरात्मा की आवाज़ से उस अंतरात्मा की आवाज़ जिसकी सुनाई के लोगों को पहले ही दे चुकी थी। लेकिन भैया क्या करें ये अंतरात्मा है कभी भी जाग सकती है। अब देखना है आगे कब फिर इसकी नींद खुलेगी...

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